अति पुण्य उदय मम आया, प्रभु तुमरा दर्शन पाया |
अब तक तुमको बिन जाने, दुःख पाए निज गुण जाने ||
पाए अनंत दुःख अब तक, जगत को निज जानकर |
सर्वग्य भाषित जगत हितकर, धर्म नहि पहिचान कर ||
भव बंधकारक सुख प्रहारक, विषय में सुख मानकर |
निज पर विवेचक ज्ञानमय, सुखनिधि सुधा नहि पानकर ||1||
तव पद उर में आये, लखि कुमति विमोह पलाए |
निज ज्ञान कला उर जागी, रूचि पूर्ण स्वहित में लागी ||
रूचि लागी हित में आतम के, सत्संग में अब मन लगा |
मन में हुई अब भावना, तव भक्ति माँ जाऊं रंगा ||
प्रिय वचन की हो टेव, गुणी गण गान में ही चित्त पगै |
शुभ शास्त्र का नित हो मनन, मन दोष वादन तैं भगै ||2||
कब समता उर में लाकर, द्वादश अनुप्रेक्षा भाकर |
ममतामय भूत भगाकर, मुनिव्रत धारूँ वन जाकर ||
धरक्र दिगम्बर रूप कब, अठ-दीस गुण पालन करूँ |
दो-बीस परीषह सह सदा, शुभ धर्म दस धारण करूं ||
तप तपूँ द्वादश विधि सुखद नित, बंध आस्रव परिहरूं |
अरु रोकी नूतन कर्म संचित, करम रिपु को निर्जरूं ||3||
कब धन्य सुअवसर पाऊं, जब निज में ही रम जाऊं |
कर्तादिक भेद मिटाऊं, रागादिक दूर भगाऊँ ||
कर दूर रागादिक निरंतर, आतम को निर्मल करूं |
बल ज्ञान दर्शन सुख अतुल, लहि चरित क्षायिक आचरूं ||
आनन्द कन्दजिनेन्द्र बन, उपदेश को नित उच्चरूं |
आवै वो कब सुखद दिन, जब दुखद भवसागर तरूं ||4||