छढाला

तीन भुवन में सार, वीतराग विज्ञानता |
शिवस्वरूप शिवकार, नमहूँ त्रियोग सम्हारिके ||

|| पहली ढाल ||

जे त्रिभुवन में जीव अनंत, सुख चाहें दुःख तैं भयवंत |
तातैं दुखहारी सुखकार, कहें सीख गुरु करुणा धार ||1||
ताहि सुनो भवि मन थिर आन, जो चाहो अपनों कल्याण |
मोह - महामद पियो अनादि, भूल आपको भरमत वादि ||2||
तास भ्रमण की है बहु गाथा, पै कुछ कहूँ कही मुनि यथा |
काल अनंत निगोद मँझार, बीत्यो एक इन्द्रीय तन धार ||3||
एक स्वास में आठ - दस बार, जनम्यो मरयो भरयो दुःखभार |
निकसी भूमि जल पावक भयो, पवन प्रत्येक वनस्पति थयो ||4||
दुर्लभ लही ज्यों, चिंतामणी, त्यों पर्याय लही त्रसतणी |
लट पिपील अलि आदि शरीर, धर -  धर मरयो सही बहूपीर ||5||
कबहूँ पंचेन्द्रीय पशु भयो, मन बिन निपट अज्ञानी थयो |
सिन्हादिक सैनी ह्वे क्रूर, निबल पशु हती खाए भूर ||6||
कबहूँ आप भयो बलहीन, सबलनि करी खायो अति दीन |
छेदन भेदन भूख पियास, भार वहन हिम आतप त्रास ||7||
वध बंधन आदिक दुःख घने, कोटि जीभ तैं जात न भने |
अति संक्लेश भाव तैं मरयो, घोर शवभृसागर में परयो ||8||
तहां भूमि पसरत दुःख इसो, बिच्छु सहस डसें नहीं तिसो
तहां राधश्रोणित वाहिनी, कृमिकुल कलित देहदाहिनी ||9||
समेर तरु दल जूस असिपत्र, असि ज्यों देह विदारें तत्र |
मेरु समान लोह गलि जाये, ऐसी शीत उष्णता थाय ||10|
तिल - तिल करें देह के खंड, असुर भिड़ावें दुष्ट प्रचंड |
सिन्धु नीरतें प्यास न जाय, तो पण एक न बूंद लहाय ||11||
तीन लोक को नाज जु खाय, मिटै न भूख कणा न लहाय |
ये दुःख भू सागर लौं सहै, करमजोग तैं नरकगति लहै ||12||
जननी उदर वस्यो नव मास, अंग सकुचतें पाई त्रास |
निकसत जे दुःख पाए घोर, तिनको कहत न आवे ओर ||13||
बालपने में ज्ञान न लह्यो, तरुण समय में तरुणी रत रह्यो |
अर्धमृतक सम बुढापनो, कैसे रूप लखै अपनो ||14||
कभी अकाम निर्जरा करै, भवनत्रिक में सुरतन धरै |
विषय चाल दावानल दह्यो, मरत विलाप करत सुख सह्यो ||15||
जो विमानवासी हूँ थाय, सम्यगदर्शन बिन सुख पाए |
तहतैं चय थावर - तन धरै, यों परिवर्तन पूरे करै ||16||

|| दूसरी ढाल ||

ऐसे मिथ्यादृग ज्ञानचरण, वश भ्रमत भरत दुःख जन्म - मरण |
तातें इनको तजिए सुजान, सुन तिन संक्षेप कहूँ बखान ||1||
जीवादि प्रयोजनभूत तत्व, श्रधे तिन माहि विपर्यत्व |
चेतन को है उपयोगरूप, विनमूरत चिन्मुरत अनूप ||2||
पुदगल नभ धर्म अधर्म काल, इनतें न्यारी है जीव चाल |
ताकों न जान विपरीत मान, करि करै देह में निज पिछान ||3||
मैं सुख दुखी मैं रंक राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव |
मेरे सुत तीय मैं सबल दीन, बेरूप सुभग मूरख प्रवीन ||4||
तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत अपने को नाश मान |
रागादि प्रगट जे दुःख देन, तिन ही को सेवत गिनत चैन ||5||
शुभ - अशुभ बंध के फल मंझार, रति - अरति करै निजपद विसार |
आतमहित हेतु विरागज्ञान, ते लखे आपको कष्टदान ||6||
रोकी न चाह निज शक्ति खोय, शिवरूप निराकुलता न जोय |
याही प्रतीतिजुट कछुक ज्ञान, सो दुखदायक अज्ञान जान ||7||
इन जुट विषयनि में जो प्रवृत्त, ताको जानो मिथ्याचरित्र |
यों मिथ्यात्वादी निद्र्ग जेह, अब जे गृहीत सुनिए सुतेह ||8||
जो कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव, पौषे चिर दर्शनमोह एव |
अंतर रागादिक धरें जेह, बाहर धन अम्बरतैं सनेह ||9||
धारैं कुलिंग लहि महत भाव, ते कुगुरू जन्मजल उपल नाव |
जे राग द्वेष मल करि मलीन, वनिता गदादिजुट चिन्ह चीन ||10||
ते हैं कुदेव तिनकी जु सेव, शठ करत न भवभ्रमण छेव |
रागादि भाव हिंसा समेत, द्रवित त्रस थावर मरण खेत ||11||
जे क्रिया तिन्हैं जानहू कुधर्म, तिन सरधे जीव लहे अशर्म |
याकू ग्रहीत मिथात्व जान, अब सुन ग्रहित जो है अज्ञान ||12||
एकांतवाद दूषित समस्त, विष्यादिक पोषित अप्रशस्त |
कपिलादी - रचित श्रुत को अभ्यास, सो है कुबोध बहू दें त्रास ||13||
जो ख्याति लाभ पुजादि चाह, धरी करन विविधविध देहदाह |
आतम - अनातम के ज्ञानहीन, जे जे करनी तन करन छीन ||14||
ते सब मिथ्याचरित्र त्याग, अब आतम के हित पंथ लाग |
जगजाल भ्रमण को देहु त्याग, अब दौलत आतम सुपाग ||15||

|| तीसरी ढाल ||

आतम को हित है सुख सो सुख, आकुलता बिन कहिये |

आकुलता शिव माहीं न तातें, शिवमग लाग्यो चहिये ||
सम्यगदर्शन - ज्ञान - चरण शिवमग सो दुविध विचारो |
जो सत्यारथ रूप सो निश्चय, कारण सो व्यवहारो ||1||
परद्र्व्यन तें भिन्न आप में, रूचि सम्यक्त्व भला है |
आपरूप को जान पनो सो, सम्यगज्ञान कला है ||
आपरूप में लीन रहे थिर, सम्यग चरित्र सोई |
अब व्यवहार मोक्ष - मग सुनिए, हेतु नियत को कोई ||2||
जीव अजीव तत्व अरु आस्रव, बंध रु संवर जानो |
निर्जर मोक्ष कहे जिन तिन को, ज्यों का त्यों सरधानो ||
है सोई समकित व्यवहारी, अब इन रूप बखानो |
तिनको सुन सामान्य विशेषें, दृढ प्रतीति उर आनो ||3||
बहिरातम अंतर - आतम, परमातम जीव त्रिधा है |
देह – जीव को एक गिने, बहिरातम तत्व मुधा है ||
उत्तम मध्यम जघन त्रिविध के, अंतर आतम ज्ञानी |
द्विविध संग बिन शुद्ध उपयोगी, मुनि उत्तम निज-ध्यानी ||4||
मध्यम अंतर आतम हैं जे, देशव्रती अनगारी |
जघन कहे अविरत समदृष्टि, तीनों शिव-मगचारी ||
सकल-निकल परमातम द्वैविध, तिन में घाति निवारी |
श्री अरहंत सकल परमातम, लोकालोक निहारी ||5||
ज्ञानशरीरी त्रिविध कर्म-मल वर्जित सिद्ध महंता |
ते हैं निकल अमल परमातम, भोगें शर्म अनंता ||
बहिरातमता हेय जानि तजि, अंतर-आतम हूजै |
परमातम जो ध्याय निरंतर, जो निज आनन्द पूजै ||6||
चेतनता बिन सो अजीब हैं, पंच भेद ताके हैं |
पुदगल पंच वरन रस गंध दो, फरस कसू जा के हैं ||
जिय पुदगल को चलन सहाई, धर्मद्रव्य अनरूपी |
तिष्ठय होय अधर्म सहाई, जिन बिन मूर्ती निरूपी ||7||
सकल द्रव्य को वास जास में, सो आकाश िछानो |
नियत वर्तना निशि-दिन सो, व्यवहार काल परिमानो ||
यों अजीव अब आस्रव सुनिए, मन-वच-काय त्रियोगा |
मिथ्या अविरति अरु कषाय, परमाद सहित उपयोगा ||8||
ये ही आतम दुःख के कारण, तातें इनको तजिए |
जीव प्रदेश बंधे विधि सों, सो बंधन कबहूँ न सजिये ||
शम-दम तें जो कर्म न आवें, सो संवर आदरिये |
पट-बल तें विधि झरन निर्जरा, ताहि सदा आचरिये ||9||
सकल कर्म तैं रहिये अवस्था, सो शिव थिर सुखकारी |
इह विधि जो सरधा तत्वन की, सो समकित व्योहारी ||
देव जिनेन्द्र, गुरु परिग्रहन बिन, धर्म दयाजुत सारो |
यहू मान समकित को कारण, अष्ट अंगजुट धारो ||10||
वसु मद टारि निवारी त्रिशठता, षत अनायतन त्यागो |
शंकादिक् वसु दोष बिना, सम्वेगादिक चित पागो ||
अष्ट अंग अरो दोष पचीसों, अब संक्षेप हू कहिये |
बिन जानें तैं दोष गुनन को, कैसे तजिए गहिये ||11||
जिन-वच में शंका न धारि वृष, भव सुख वांछा भानै |
मुनि तन मलिन न देख घिनावें, तत्व कुतत्व पिछाने ||
निज-गुण अरु पर-औगुण ढाकें, व निज धर्म बढ़ावे |
कामादिक क्र वृषतैं चिगते, निजपर को सु दिढ़ावे ||12||
धर्मी सों गो-वच्छ प्रीती सम, कर निज धर्म दीपावै |
इन गुन तैं विपरीत दोष वसु, तिनको सतत खिपावै ||
पिता भूप वा मातुल नृप जो, होय तो ना मद ठानै |
मद न रूप को, मद न ज्ञान को, धन-बल को मद भानै ||13||
तप को मद न मद प्रभुता को, करै न सो निज जानै |
मद धारै तो यही दोष वसु, समकित को मल ठानै ||
कुगुरू कुदेव कुवृश सेवक की, नहिं प्रशंस उचरै है |
जिनमुनी जिन श्रुत बिन, कुगुरू आदिक तिन्हें न नमन करै है ||14||
दोष-रहित गुण-सहित सुधि जे, सम्यगदर्शन चहे हैं |
चरितमोहवश लेश न संयम, पै सुरनाथ जजे हैं ||
गेही पै, गृह में न रचे ज्यों, जल तैं भिन्न कमल है |
नगर-नारी को प्यार यथा, कादे में हेम अमल है ||15||
प्रथम नरक बिन षट भू ज्योतिष, वान भवन पंढ नारी |
थावर विकलत्रय पशु में नहि, उपजत समकित धारी ||
तीन लोक तिहूँ काल मांही नही, दर्शन सम सुखकारी |
सकल धरम को मूल यही, इस बिन करनी दुखकारी ||16||
मोक्षमहल की परथम सीढ़ी, या बिन ज्ञान-चरित्रा |
सम्यकता न लहै सो दर्शन, धारौ भव्य पवित्रा ||
“दौल” समझ न सुन चेत सयाने, काल वृथा मत खोवै |
यह नरभव फिर मिलन कठिन है, जो सम्यक नहीं होवै ||17||

|| चौथी ढाल ||

सम्यक श्रद्धा धारि पुनि, सेवहु सम्यकज्ञान |
स्वपर अर्थ बहू धर्मजुत, जो प्रगटावन भान ||1|
सम्यक साथै ज्ञान होय, पै भिन्न अराधौ |
लक्ष्ण ज्ञान श्रध्दा जान, दुहू में भेद अवाधौ ||
सम्यक कारण जान, ज्ञान कारज है सोई |
युगपद होते हू, प्रकाश दीपक तैं होई ||2||
तास भेद दो हैं परोक्ष, परतछि तिन मांही |
मती श्रुत दोए परोक्ष, अक्ष मान तैं उपजाहीं ||
अवधिज्ञान मनपप्रजय, दो हैं देश प्रतच्छा |
द्रव्य क्षेत्र परिमाण लिए, जानैं जिय स्वच्छा ||3||
सकल द्रव्य के गुण अनंत, परजाय अनंता |
जानै एकै काल प्रगट, केवलि भगवंता ||
ज्ञान समान न आन, जगत में सुख को कारण |
इह परमामृत जन्म-जरा-मृतु रोग निवारण ||4||
कोटि जन्म तप तपैं, ज्ञान बिन कर्म झरैं जे |
ज्ञानी के छन चिन माहीं, गुप्ति तैं सहज टरें ते ||
मुनिव्रत धार अनंत बार, ग्रीवक उपजायो |
पै निज आतम ज्ञान बिना, सुख लेश न पायो ||5||
तातैं जिनवर कथित, तत्व अभ्यास करीजै |
संशय विभ्रम मोह त्याग, आपौ लख लीजै ||
यह मानुष परजाय, सुकुल सुनिवौ जिनवानी |
इहविधि गयें न मिले, सुमनि ज्यों उदधि समानी ||6||
धन समाज गज बाज, राज तो काज न आवै |
ज्ञान आपको रूप भये, फिर अचल रहावै ||
तास ज्ञान को कारण, स्व-पर विवेक बखान्यो |
कोटि उपाय बनाय, भव्य ताको उर आन्यो ||7||
जे पूरब शिव गए, जाहिं अब आगै जैहें |
सो सब महिमा ज्ञानतनी, मुनिनाथ कहै हैं ||
विषय चाह दव दाह, जगत जन अरनि दझावै |
तास उपाय न आन, ज्ञान घनघान बुझावै ||8||
पुण्य-पाप फल माहीं, हरख बिलखौ मत भाई |
यह पुदगल परजाय, उपजै विनसै थिर थाई ||
लाख बात की बात, यहै निश्चय उर लावो |
तोरि सकल जग दंद फंद, निज आतम ध्यावो ||9||
सम्यकज्ञानी होए बहुरि, दृढ चरित लीजै |
एकदेश अरु सकलदेश, तस भेद कहीजै ||
त्रसहिंसा को त्याग, वृथा थावर न संहारै |
पर वधकार कठोर निंद्य, नहिं वचन उचारे ||10||
जल मृतिका बिन और, नाहि कुछ गहै अद्त्ता |
निज वनिता बिन सकल, नारि सों रहे विरत्ता ||
अपनी शक्ति विचार, परिग्रह थोरो राखै |
दशदिशि गमन प्रमान ठान, तसु सीम ना राखे ||11||
ताहू मी फिर ग्राम, गली गृह बाग बजारा |
गमनागमन प्रमान, ठान अन सकल निवारा ||
काहू की धन-हानि, किसी जय-हार न चिंतै |
देय न सो उपदेश, होए अघ वनिज कृशितें ||12||
कर प्रमाद जम भूमि, वृक्ष पावक न विराधे |
असि धनु हल हिन्सोपकरन, नहि दे जस लाधे ||
राग-द्वेष करतार कथा, कबहूँ न सुनीजै |
औरहू न अनरथदंड, हेतु अघ तिन्हैं न कीजै ||13||
धर उर समता भाव, सदा सामयिक करिए |
परव चतुष्टय मांही, पाप तजि प्रोषध धरिये ||
भोग और उपभोग, नियम करि ममत निवारै |
मुनि को भोजन देय, फेर निज करहि अहारै ||14||
बारह व्रत के अतिचार, पन पन न लगावै |
मरण समय सन्यास धारि, तसु दोष नशावै ||
यों श्रावक व्रत पाल, स्वर्ग सोलम उपजावे |
तंहतैं चय नर जन्म पाए, मुनि ह्वै िव जावै ||15||

|| पाँचवी ढाल || (बारह भावना)

मुनि सकलव्रती बडभागी, भव-भोगन तैं वैरागी |
वैराग्य उपावन माई, िन्त्यों अनुप्रेक्षा भाई ||1||
इन िन्तत समरस जागै, जिि ज्वलन पवन कै लागै |
जब ही जिय आतम जानै, तब ही जिय िवसुख ठानै ||2||
जोवन गृह गो धन नारी, हय गय जन आज्ञाकारी |
इन्द्रिय भोग छिन थाई, सुरधनु चपला चपलाई ||
सुर असुर खगािप जेते, ब्रिग जो हरि काल दले ते |
मणि तंत्र मन्त्र बहू होई, मरते न बचावै कोई ||4||
चहुँगति दुःख जीव भरे हैं, परिवर्तन पंच करै हैं |
सब विधि संसार असारा, यामै सुख नाहि लगारा ||5||
शुभ-अशुभ करम फल जेते, भोगे जिय एकहि तेते |
सुत दारा होए न सीरी, सब स्वारथ के हैं भीरी ||6||
जल पय ज्यों तिन मेला, पै भिन्न-भिन्न नहीं भेला |
तो प्रगट जुदे धन धामा, क्यों ह्वे इक मिलि सुत रामा ||7||
पल रुधिर राध मल थैली, कीकस वसादि में मैली |
नव द्वार बनें घिनकारी, अस देह करै किम यारी ||8||
जो योगन की चपलाई, तातैं हवें आस्रव भाई |
आस्रव दुखकार घनेरे, बुधिवंत तिन्हैं निरवेरे ||9||
जिन पुण्य-पाप नहि कीना, आतम अनुभव चित दीना |
तिन ही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके ||10||
निज काल पाय विधि झरना, तासों निज काय न सरना |
तप करि जो कर्म खपावै, सोई शिवसुख दरसावै ||11||
किनहूँ न कर्यो धरै को, षटद्रव्यमयी न हरै को |
सो लोक माहि बिन समता, दुःख सहै जीव नित भ्रमता ||12||
अंतिम ग्रीवक लों की हद, पायो अनंत बिरियाँ पद |
पर सम्यकज्ञान न लाध्यो, दुर्लभ निज में मुनि साध्यो ||13||
जे भाव मोह तैं न्यारे, दृग ज्ञान व्रतादिक सारे |
सो धर्म जबै निय धारै, तब ही सुख अचल निहारै ||14||
सो धर्म मुनिन करि धरिये, तिनकी करतूति उचरिये |
ताको सुनिए भवि प्राणी, अपनी अनुभूति पिछानी ||15||

|| छटवी ढाल ||

षटकाय जीव न हनन तैं, सब विधि दरव हिंसा टरी |
रागादी भाव निवारि तैं, हिंसा न  भावित अवतरी ||
जिनके न लेश मृषा न जल, मृण हू बिना दियो गहै |
अठदश सहस विधि शीलधर चिद ब्रम्ह में नित रमि रहै ||1||
अन्तर चतुर्दश भेद बाहिर, संग दशधा तैं टलें |
परमाद तजि चउकर लखि, समिति ईर्ष्या तैं चलें ||
जग सुहितकर सब अहितकर, श्रुति सुखद सब संशय हरें |
भ्रम-रोग हर जिनके वचन, मुख चन्द्र तैं अमृत झरैं ||2||
छयालीस दोष बिना सुकुल, श्रावक तने घर अशन को |
लें तप बढ़ावन हेत नहिं तन, पोषते तजि रसन को ||
शुचि ज्ञान संजम उपकरण, लखि के गहैं लखि के धरैं |
निर्जन्तु थान विलोकि तन मल, मूत्र शलेषम परिहरें ||3||
सम्यक प्रकार निरोधि, मन-वच-काय आतम ध्यावे |
तिन सुथिर-मुद्रा देखि मृगनन, उपल खाज खुजावते ||
रस रूप गंध तथा फरस अरु, शब्द शुभ असुहावने |
तिन में न राग विरोध, पंचेन्द्रिय जयन पद पावने ||4||
समता सम्हारें थुति उपचारें, वन्दना जिनदेव को |
निज करैं, श्रुतिरति करैं, प्रतिक्रम तजैं तन अहमेव को ||
जिनके न न्होन न दंतधोवन, लेश अम्बर आवरन |
भू माहीं पिछली रयनि में, कुछ शयन एकाशन करन ||5||
इक बार दिन में लें आहार, खड़े अलप निज पान में |
कचलोंच करत न डरत परिषह, सों लगे निजध्यान में ||
अरिमित्र महलमसान कंचनकांच निंदन-थुतिकरन |
अर्घावतारन असि-प्रहारन, में सदा समता धरन ||6||
तप तपैं द्वादश, धरें वृष दश, रतनत्रय सवें सदा |
मुनि साथ में वा एक विचरें, चहैं नहि भवसुख कदा ||
यों हैं सकलसंजम चरित, सुनिए स्वरूपाचारन अब |
जिस होत प्रगटै अपनी निधि, मिटै पर की प्रवृत्ति सब ||7||
जिन परम पैनी सुबुधि छैनी, डारि अंतर भेदिया |
वरणादि अरु रागादीतैं, निज भाव को न्यारा किया |
निजमाहिं निज के हेतु, निज कर आपको आपै गह्यो ||
गुन गुनी ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय, मँझार कुछ भेद न रह्यो ||8||
जहाँ ध्यान ध्याता ध्येय को, न विकल्प वच भेद न जहाँ |
चिदभाव कर्म चिदेश करता, चेतना किरिया जहाँ ||
तीनों अभेद अखिन्न शुध, उपयोग की निश्चल दशा |
प्रगटी, जहाँ दृग-ज्ञान-व्रत, ये तीनधा एके लशा ||9||
परमान नये निक्षेप को, न उद्योत अनुभव में दिखे |
दृग ज्ञान सुख बलमय सदा, नहि आन भाव जु मो विखे ||
मैं साध्य-साधक मैं अबाधक, कर्म अरु तसु फलनि मैं |
चितपिंड चंड अखंड, सुगुण करंड च्युत पुनि कलनि तैं ||10||
यों निज में थिर भये, तिन अकथ को आनन्द लह्यो |
सो इंद्र नाग नरेंद्र वा, अहमिन्द्र के नाही कह्यो ||
तब ही शुकल ध्यानाग्नी करि चउघाति-विधि-कानन दह्यो |
सब लख्यो केवलज्ञान करि, भवि लोकको शिवमग कह्यो ||11||
पुनि घाति शेष अघाति-विधि चिन माहीं अष्टम भू बसैं |
वसु-कर्म विनशै सुगुण वसु, सम्यक्त्व आदिक सब लसैं ||
संसार खर अपार, पारावार तरि तिरहीं गये |
अविकार अकल अरूप शुध, चिद्रूप अविनाशी भये ||12||
निज माहीं लोक अलोक, गुण-परजाय प्रतिबिम्ब थये |
रहि हैं अनंत काल, यथा तथा शिव परिणये ||
धनि धन्य हैं वे जीव नरभव, पाय यह कारज किया |
तिन ही अनादि भ्रमन पंच प्रकार, तजि वर सुख लिया ||13||
मुख्योप्चार दुभेद यों, बडभागि रत्नत्रय धरें |
अरु धरें ते शिक लहैं, तिन, सुजस जल-मल हरें ||
इमि जानि, आलस हानि, साहस ठानि यह सीख आदरो |
जब लों न ओरोग जरा गहै, तब लों झटीति निज हित करो ||14||
यह राग-आग दहै सदा, तातैं समामृत सेइये |
चिर भये विषय-कषाय अब तो, त्याग निजपद बेइये ||
कहा रच्यो पर-पद में, न तेरो पद यहै, क्यों दुःख सहै |
अब भक्त हाउ सुखी, स्वपद रचि, दाव मत यहै ||15||

इक नव वसु इक वर्ष की, तीज शुकल बैशाख |
करयो तत्व उपदेश यह, लखि बुधजन की भाख ||1||
लघुधी तथा प्रमादतैं, शब्द अर्थ की भूल |
सुधि सुधार पढो सदा, जो पावो भवकूल ||2||

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