||मूल मन्त्र||
णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं||
णमो आयरियाणं णमो उवज्झायाणं||
णमो लोए सव्व साहूणं||
एसोपंचणमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो||
मंगला णं च सव्वेसिं, पडमम हवई मंगलं||
||मंगल पाठ||
चत्तारि मंगल - अरहंता मंगलं, सिध्दा मंगलं,
साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगल ॥
चत्तारिलोगुत्तमा-अरिहंता लोगुत्तमा, सिध्दा लोगुत्तमा,
साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मों लोगुत्तमा ।|
चत्तारिशरणं पव्वज्जमि-अरिहंत शरणं पव्वज्जामि, सिध्द शरणं
पव्वज्जामि, साहू शरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तो धम्मंशरणं पव्वज्जामि ।|
भावार्थ
अरिहंतो को नमस्कार हो ।
सिध्दों को नमस्कार हो ।
आचार्यों को नमस्कार हो ।
उपाध्यायों को नमस्कार हो ।
लोक के सर्व साधुओं को नमस्कार है ।
अर्थ लोक में चार मंगल हैं:
अरिहन्त मंगल है| सिध्द मंगल है|
साधु मंगल है| केवली प्रणीत जिन धर्म मंगल है।
अर्थ लोक में चार उत्तम है:
अरिहंत उत्तम हैं| सिध्द उत्तम है।
साधु उत्तम है| केवली प्रणीत जिनधर्म उत्तम है।
अर्थ लोक में चार शरण हैं:
अरिहन्तों की शरण है। सिध्दों की शरण है।
साधुओं की शरण है। केवलि प्रणीत जिनधर्म की शरण है।